Saturday, November 13, 2010

रे पंछी उड़ जा


शहर की भागा दौड़ी में,
काहे भूल गया पहचान,
रे पंछी उड़ जा,
तोहे बुलाये तेरा धाम..


बिसरे हैं अब नन्द जसोदा,
बिसरी घर गाम की गलियाँ,
वहां तो सब तौहार थे तेरे,
यहाँ ना वो रंग रलियाँ,
अरे किशन लड़े थे एक कंस से,
यहाँ हज़ारों नाम..
रे पंछी उड़ जा तोहे बुलाये तेरा धाम...

धन दौलत के चक्कर में
अपनों का संग था छूटा,
लोभ कि चटनी संग मिला
हर सख्स यहाँ था झूठा,
अंत समय अब यही सोचता
माया मिली ना राम...
रे पंछी उड़ जा
तोहे बुलाये तेरा धाम..

3 comments:

  1. सही लिखा है भैया ....बढ़िया भावपूर्ण रचना है.

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  2. बहुत कम हैं जो वापिस जा पाते हैं ... बहुत अछि बात कही है आपने रचना के माध्यम से ...

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