Tuesday, November 9, 2010

अनकहे जज़्बात


एकमुश्त, अनगिनत ख़याल उमड़े,
धडकनें तेज़ हुईं,
और दिमाग़ी तार आपस में उलझ गए,
जुबां ने साथ ना दिया,
हाथों ने कलम उठा ली
और उतार दिए सारे जज़्बात काग़ज़ पर,
देखा तो कुछ नज़्में
मेरी डायरी में अठखेलियाँ कर रहीं थीं..

2 comments:

  1. यूँ ही होता है नज़्म का जन्म!

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  2. मेरे एक मित्र जो गैर सरकारी संगठनो में कार्यरत हैं के कहने पर एक नया ब्लॉग सुरु किया है जिसमें सामाजिक समस्याओं जैसे वेश्यावृत्ति , मानव तस्करी, बाल मजदूरी जैसे मुद्दों को उठाया जायेगा | आप लोगों का सहयोग और सुझाव अपेक्षित है |
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