Wednesday, November 17, 2010

विरह के मीठे पल (ग़ज़ल)


इस दिल के ख़ाली गुलशन में
कुछ महक रहे हैं गुल ऐसे,
कुछ अरमाँ उफ़न रहे हैं
कोई सहर उठ रही जैसे ||


कुछ पल ये अंदाज़ नया
मुझको अहसास दिलाता है,
धाराएँ कुछ तन और मन की
कहीं दूर मिल रहीं जैसे ||

कभी विरह के आलम में
ये पल कुछ ऐसा लगता है,
प्यासी धरती पर मेघदूत बन
एक चातक आया जैसे ||

इस पल के ऐसे बीतने पर
एक शीतलता छा जाती है,
इस तन को गरमानी वाली
कोई आग बुझ रही जैसे ||

2 comments:

  1. khubsurat gazal. behtar prastuti

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  2. bahut khoob ... combination of thoughts bahut khoobsurat hai ...

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