देर कर दी आज,
चाँद ने उफ़क से उठने में,
पूछना था मुझे-
की ऐसा क्या है उसकी शफ्फाक चांदनी में,
जो दिन के सारे ग़मों को छानकर
मेरी क़लम की आहट को
ख़ुशनुमा कर देती है..
और
हर नज़्म इसमें धुलकर,
शब के अँधेरे अहसास को-
बहा ले जाती है..
आज चाँद ने उठने में देर कर दी,
क्योंकि,
आज मेरी क़लम ने-
ग़म और उदासी भरा दरिया बहाया है....
Friday, October 22, 2010
Friday, October 15, 2010
ये मन आवारा पंछी
इस मन आवारा पंछी का,
हर डाल बसेरा होता है,
कभी तो मंज़िल पाता है,
पर कभी ये सब कुछ खोता है..
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...
क्यूँ भटक रहा उन गलियों में,
जो अँधेरी सुनसान सी हैं,
क्यूँ बात ये ऎसी पूछ रहा,
जो सबके लिए अनजान सी है,
जब ऐसे हों हालात तो क्या, कभी सवेरा होता है,
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...
कोई दर्द रहा होगा ऐसा,
हर वक़्त इसे तड़पाता है,
शायद कोई शख्स रहा होगा,
जो इसे बहुत ही भाता है,
उन भूली बिसरी यादों को जब, ढूँढने निकला होता है,
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...
हर डाल बसेरा होता है,
कभी तो मंज़िल पाता है,
पर कभी ये सब कुछ खोता है..
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...
क्यूँ भटक रहा उन गलियों में,
जो अँधेरी सुनसान सी हैं,
क्यूँ बात ये ऎसी पूछ रहा,
जो सबके लिए अनजान सी है,
जब ऐसे हों हालात तो क्या, कभी सवेरा होता है,
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...
कोई दर्द रहा होगा ऐसा,
हर वक़्त इसे तड़पाता है,
शायद कोई शख्स रहा होगा,
जो इसे बहुत ही भाता है,
उन भूली बिसरी यादों को जब, ढूँढने निकला होता है,
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...
Wednesday, September 29, 2010
अर्ज़ है..
अब क्या बतलाएं हाल-ए-दिल,
किस तरह जीया करते हैं,
कुछ यादें हैं कुछ लम्हों की,
बस उन्हें पीया करते है !!
*******************
कुछ तंग से थे दिल, कुछ तंग से थे हम,
कुछ तंग थी वहां, गलियां वो इश्क की,
निकले जो ढूँढने, दिलवर सा खज़ाना,
जो ख़ाक सा मिला, उसे मुकद्दर समझ लिया !!
********************
देख लीं बहुत, हसीनाओं की महफ़िल,
लुट जाए जिसपे दिल, कोई ऐसा नहीं मिला,
अब डूबे रहते हैं, शबो-सहर शराब में,
ना अपनों से मुहब्बत है, ना दुश्मन से है गिला !!
********************
किस तरह जीया करते हैं,
कुछ यादें हैं कुछ लम्हों की,
बस उन्हें पीया करते है !!
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कुछ तंग से थे दिल, कुछ तंग से थे हम,
कुछ तंग थी वहां, गलियां वो इश्क की,
निकले जो ढूँढने, दिलवर सा खज़ाना,
जो ख़ाक सा मिला, उसे मुकद्दर समझ लिया !!
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देख लीं बहुत, हसीनाओं की महफ़िल,
लुट जाए जिसपे दिल, कोई ऐसा नहीं मिला,
अब डूबे रहते हैं, शबो-सहर शराब में,
ना अपनों से मुहब्बत है, ना दुश्मन से है गिला !!
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Saturday, September 25, 2010
-उदास लम्हे-
Friday, September 24, 2010
"रे मन तू ले चल दूर कहीं.."
रे मन तू ले चल दूर कहीं..
जब पंछी करे पुकार
तो नभ कर ले सोलह श्रिंगार,
जहाँ इन्द्रधनुष की छाया में
जग भर ले रंग हज़ार...
रे मन तू ले चल दूर कहीं..
जहाँ अपनापन हो हर घर में
हर ईश्वर हो हर आँगन में,
जहाँ हर प्यासे राही के लिए
अमृत झलके सबके मन में..
रे मन तू ले चल दूर कहीं..
जहाँ यौवन की हर आँधी में
मुश्किल पत्तों सी उड़ जाए,
और बड़े बुजुर्गों के हाथों में
मासूम सा बचपन खिल जाए...
रे मन तू ले चल दूर कहीं.......
Monday, September 13, 2010
सपने ना गिर जाएँ..
मुट्ठी ना खुल जाए,
जो बीने हैं राहों से,
सपने ना गिर जाएँ...
कस के बाँध ले झोली,
जब तू दौड़े जीवनपथ पर,
कहीं तेरे आवेग में ये
झोली ना खुल जाए...
Tuesday, September 7, 2010
मेरे कुछ गीत पुराने..
कुछ रुकी हुई सी बातें,
और अनकहे अफ़साने,
रह रह कर गूँज रहे मन में,
मेरे कुछ गीत पुराने..
कुछ सुर थे बांस की बंसी पर,
कुछ एकतारे की तान पे थे,
जो राग अधूरे ठहरे थे,
वो वीणा की रुन्झान में थे..
ना जाने क्यों ये रुक सी गई,
जो कलम कभी दीवानी थी,
आवाज़ भी मेरी रूठ गई,
हर मौसम जो मस्तानी थी...
कुछ याद नहीं क्या भूल रहा,
शायद कुछ चला था गाने,
रह रह कर गूँज रहे मन में,
मेरे कुछ गीत पुराने..
और अनकहे अफ़साने,
रह रह कर गूँज रहे मन में,
मेरे कुछ गीत पुराने..
कुछ सुर थे बांस की बंसी पर,
कुछ एकतारे की तान पे थे,
जो राग अधूरे ठहरे थे,
वो वीणा की रुन्झान में थे..
ना जाने क्यों ये रुक सी गई,
जो कलम कभी दीवानी थी,
आवाज़ भी मेरी रूठ गई,
हर मौसम जो मस्तानी थी...
कुछ याद नहीं क्या भूल रहा,
शायद कुछ चला था गाने,
रह रह कर गूँज रहे मन में,
मेरे कुछ गीत पुराने..
Wednesday, September 1, 2010
यादों का पुलिंदा

तन्हाई में बैठे हुए अक्सर,
जेहन में कुछ ख्याल उभरते हैं
कुछ अधूरे और कुछ अटूट रिश्ते,
मन के खाली अशांत कौनों को
भरने लगते है..
और देखते ही देखते खुल जाता है
मेरी खोई हुई स्वप्ननगरी की
यादों का पुलिंदा !!!
इस पुराणी जर्जर पोटली के
फटे हुए कोनों से गिरती हैं
कुछ सहज सी सख्सियतें
देती थीं हर मोड़ और उलझनों भरे चौराहे पर
अपने भरोसे का सहारा...
कहते थे जिन्हें साथी हमकदम,
मेरी परछाई से भी वाकिफ थे...
आज समेट लेना चाहता हूँ
उन सारे लम्हों को
जो बिखरे पड़े हैं,
इस फटे और खुले हुए,
मेरी यादों के पुलिंदे से...............
Friday, May 14, 2010
लाल ज़मीं ?? (नज़्म)
Sunday, April 4, 2010
अंतराग्नि ( PAF २०१०, छात्रावास २, ७, ८ और तानसा हाउस IIT Bombay)

अंतराग्नि...
हर मानव के वजूद की लौ,
उसके सपनों का आधार,
हर मुश्किल से लड़ने का हौसला,
और उसकी विजय का प्रतिबिम्ब...
ये उसकी अंतराग्नि....
चाहे तो तू बुरा है, चाहे तो भला है,
तेरे ही कर्मों की छाया से,
तेरा अस्तित्व निकला है...
गर चाहता है अँधेरे में सूरज की चमक,
और कर्मों में सिंह सा जोश,
तो प्रज्ज्वलित कर...
अपनी अंतराग्नि....
रख विश्वास तू खुद पर,
ना बैठ निर्जीव सा होकर,
तेरी राहों की हर बाधा,
और अंतर्मन की हर व्याधा,
भस्म कर देगी...
ये तेरी अंतराग्नि....
हर मानव के वजूद की लौ,
उसके सपनों का आधार,
हर मुश्किल से लड़ने का हौसला,
और उसकी विजय का प्रतिबिम्ब...
ये उसकी अंतराग्नि....
चाहे तो तू बुरा है, चाहे तो भला है,
तेरे ही कर्मों की छाया से,
तेरा अस्तित्व निकला है...
गर चाहता है अँधेरे में सूरज की चमक,
और कर्मों में सिंह सा जोश,
तो प्रज्ज्वलित कर...
अपनी अंतराग्नि....
रख विश्वास तू खुद पर,
ना बैठ निर्जीव सा होकर,
तेरी राहों की हर बाधा,
और अंतर्मन की हर व्याधा,
भस्म कर देगी...
ये तेरी अंतराग्नि....
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