Friday, October 22, 2010

- क़लम और चांदनी -

देर कर दी आज,
चाँद ने उफ़क से उठने में,
पूछना था मुझे-
की ऐसा क्या है उसकी शफ्फाक चांदनी में,
जो दिन के सारे ग़मों को छानकर
मेरी क़लम की आहट को
ख़ुशनुमा कर देती है..
और
हर नज़्म इसमें धुलकर,
शब के अँधेरे अहसास को-
बहा ले जाती है..

आज चाँद ने उठने में देर कर दी,
क्योंकि,
आज मेरी क़लम ने-
ग़म और उदासी भरा दरिया बहाया है....

3 comments:

  1. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  2. आपका ब्लॉग पसंद आया....इस उम्मीद में की आगे भी ऐसे ही रचनाये पड़ने को मिलेंगी......आपको फॉलो कर रहा हूँ |

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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