Sunday, July 24, 2011

अक्श

आईने में अक्श मेरा
कुछ अन्जाना,
अधूरा सा लगता है..
दूसरों की नज़रों से 
देखा है जो,
वो एक नहीं...
वहम के आलम में पड़े
शख्सियत के टुकड़ों को
जोड़ लूं,
शायद कोई मुक़म्मल पहचान मिले...

Sunday, June 26, 2011

सालगिरह




फिर वही दिन है,
पहर है, घड़ी है..
फिर कमरे में-
तेरा सुरूर है,
तेरी महक है...
साल भर की-
खुशियों और ग़मों से चुराकर,
कुछ बूँदें बचाई हैं
आंसुओं की...
तेरी यादों पर जमी धूल को
साफ़ करना है,
आज फिर...

Saturday, June 18, 2011

दर्द के ख़ाते


कुछ हिसाब सा बाकी है
दर्द के ख़ाते में..
कुछ बक़ाया है,
कुछ गिरवी है किसी का
मेरे पास...
ये ख़ाते-
खुले में रखता हूँ,
कोई चुराता नहीं..
ना गलते हैं,
ना जलते हैं,
रूह से जुड़कर
रूह बन गए हैं..
ये ख़ाते अब ख़त्म ना होंगे,
क्योंकि-
कुछ हिसाब सा बाकी है अभी....

Friday, June 10, 2011

रोशनदान



रोशनदान से गिरा
वो रौशनी का धब्बा,
जो बाहर की दुनियां के
उजलेपन का अक्श था,
कमरे के अँधेरे को
छन से मिटा गया...
कभी दिल में अँधेरा होगा
तब उसी उजले धब्बे को याद करूंगा,
कोई रोशनदान खोलूँगा,
शायद रोशनी नसीब हो..

Sunday, May 15, 2011

यादों का मल्हम



ये तितलियाँ हैं
या बुलबुलों मैं क़ैद रंग,
अंतसपटल पे बने
मेरे बचपन के चित्रों में
नए रंग भरते हुए
इधर से उधर
तैर रहे हैं हवा में..
और मैं उसी मासूमियत से
उनके पीछे खुली हथेली लिए
भाग रहा हूँ..
सोने दो
बचपन की यादों के बिस्तर पे..
आज का ग़म भुलाना है..

Saturday, April 9, 2011

बिख़री शाम



शाम आज,
कुछ बिख़री हुई,
ताने दे रही है..
अलसायी दोपहर,
दूर से,
आँखों में भरी नींद को,
खींचे जाती है..
सूखी घास को,
ओस की नन्हीं बूंदों का,
इंतज़ार है...
आँख खोलूं,
बिख़री शाम को,
जोड़ना है...
फिर गीली घास पर,
नंगे पाँव चलकर,
रात की दुल्हन का,
स्वागत करूंगा...

Tuesday, March 29, 2011

चिट्टी तस्वीर



..आधे रंग उड़कर
चिट्टे हुए जाते हैं,
तस्वीर तेरी मेरे ज़ेहन में
ग़ायब होने को है..

..ना जाने कितने लम्हे
गुज़रे तेरी दीद को,
ज़ून भरी हर रात यहाँ
काली होने को है...

..इस आलम में तू आये
तेरी मेहर होगी,
वरना ये शख्सियत भी मेरी
चिट्टी होने को है...



मायने:
चिट्टा- सफ़ेद, ज़ून- चांदनी

Thursday, March 24, 2011

तेरा अंदाज़




सावन में ये रस फुहार
मरुभूमि में स्वर्णकणों सा,
हिमगिर कि चोटी पर चमके
पहली उजली सूर्यकिरण सा,
रखता तुझको सदा ही सुद्रढ़
जीवन की हर उठा पटक में,
निष्कंटक कर देता राहें
गर हो ये तेरे जीवन में..
जिसने है पहचान बनाई
उसे ना तुम खोना यारों,
अंदाज़ कहीं जो गुमा दिया
अंजाम बुरा होगा यारों...

Saturday, March 5, 2011

जायका



यूँ ही ठहाकों में गुज़री ज़िन्दगी
तो क्या गुज़री...
कभी ग़म में भी कटे दिन,
तो जायका बदले.

नज़ारा हर रोज़ आसमां का,

चाँद भी बदलता है..
अमावस का अँधेरा तो जी लूँ,
फिर पूनम का गुलशन खिले,
तो समां बदले...

Tuesday, March 1, 2011

पनाहगाह


विचार कभी
कलम कि डोर से छूटकर
बिछड़ जाते हैं..
कुछ नज़्में
मुकम्मल मुकाम कि तलाश में कभी
भटक जाती हैं..

कुछ ऐसों के लिए
पनाहगाह बनी
मेरी डायरी....
उनके मुकाम कि तलाश
जारी है..
किसी की हो तो ले लो..