Sunday, February 5, 2012

टूटती डोर..जुड़ती डोर


सुतली जो बांधी थी तूने
किवाड़ की सांकल पे
वो टूट गयी कल..
जो पेड़ लगाया था
पखवाड़े में हमने
अमरबेल ने सुखा दिया..
हर याद पे तेरी,
बिजली गिरी है..
अब तो बस 
दिल मे तेरी तस्वीर मुक़म्मल है,
लगता है
वहां भी क़यामत होगी..
अब जल्दी ही मिलूंगा तुमसे सनम!!

9 comments:

  1. Birju bhai yadon pr kitani bhi bijali gire pr ye jati nahi hain blki aur tej ho jati hain...lajbab rachana ke liye badhai sweekaren.

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  2. बहुत भावमयी सुंदर रचना...

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  3. प्रभावशाली शब्दों के साथ एक बहुत ही बहुत ही खुबसूरत अभिवयक्ति.....

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  4. गहन भाव लिए बेहतरीन अभिव्यक्ति...

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  5. bahaut interesting ...padh ke maza aa jaye types :) sorry i cudnt express it in better words but thats exactly how i felt reading this...badhaai because its super good !!

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