Thursday, March 29, 2012

रूहें कुछ सपनों की



खुरच के देखो
गुज़रे वक़्त को,
कुछ लाशें मिलेंगी ख़्वाबों की,
रूहें इनकी-
कुछ सवाल करती हैं,
जिनका कोई जवाब नहीं
बस
एक मायूस दिल है..
ये रूहें गुज़रे ख़्वाबों की-
सताती रहेंगी,
जब तलक
मेरी रूह भी
इनमें मिल नहीं जाती..

Sunday, March 25, 2012

कुछ ख़याल जो छूट गए..

!! कभी दिल में तमन्ना हो
   तो आ जाना मेरे दुश्मन,
   किसी बेगाने मंज़र में
   गिले शिक़वे भुला लेंगे !!

*****

!! मेरा मौला वहीँ रहता
   जहाँ दिल साफ़ बसते हैं,
   वो इंसानी फ़रिश्ते जो 
   ज़ुबां से साज़ लिखते हैं !!

*****

!! वो हर पल बात करते हैं
    मेरे दिल को जलाने की,
    ना उनको इल्म है इतना
    ये दिल आंसू बहाता है !!

*****

Sunday, February 5, 2012

टूटती डोर..जुड़ती डोर


सुतली जो बांधी थी तूने
किवाड़ की सांकल पे
वो टूट गयी कल..
जो पेड़ लगाया था
पखवाड़े में हमने
अमरबेल ने सुखा दिया..
हर याद पे तेरी,
बिजली गिरी है..
अब तो बस 
दिल मे तेरी तस्वीर मुक़म्मल है,
लगता है
वहां भी क़यामत होगी..
अब जल्दी ही मिलूंगा तुमसे सनम!!

Thursday, January 19, 2012

दौर शब्-ओ-सहर का चलता रहेगा !!


रुकने से तेरे
ये वक़्त न थमेगा,
दौर ये शब्-ओ- सहर का
चलता रहेगा..

गर इरादों में हो
जुनूँ की हुकूमत,
हर लम्हे में हो
कोशिशों की हकीकत,
सिलसिला मुक़ामों का बनता रहेगा,
दौर ये शब्-ओ-सहर का
चलता रहेगा...

Saturday, November 12, 2011

दस्तक



कुछ अधूरे ख़्वाब 
मेरी दबी हुई ख्वाहिशों की डोर थामे,
क़ायनात की ख़ूबसूरती से गुज़रते हुए,
हज़ारों मंज़िलों पर दस्तक देते है...
हर मंजिल 
एक अनजान पहेली की तरह,
मेरे सवालों का जवाब,
एक नए सवाल से देती है...और 
हमेशा की तरह,
उसका मेरे पास
ना ही कोई जवाब होता है और...

ना ही एक नया सवाल...हर मंजिल से गुज़रते गुज़रते,
ख्वाहिशो को दबाती हुई परत,
और सख्त हो जाती है,
और मेरे अधूरे ख़्वाब....
उन सख्ती से दबी हुए,
मेरी ख्वाहिशों की डोर 
थामे,
कायनात की खूबसूरती से गुज़रते हुए,
फिर किसी नयी मंजिल के दरवाज़े पर 
दस्तक देते है....


(Republished after editing)

Sunday, October 23, 2011

वक़्त और किस्से


किस्से..सुने थे,
कुछ पढ़े थे,
कुछ से हुआ था रू ब रू,
तो कुछ को जी रहा हूँ...
ये किस्से ईंधन हैं,
इन्हीं से वक़्त चलता है..
इस वक़्त के सफ़र के अगले पड़ाव तक-
मैं भी ईंधन बनूँगा,
मैं भी...
एक किस्सा बनूँगा...
कोई सुनेगा, कोई पढ़ेगा...
कोई जीएगा मुझे भी...

Saturday, September 24, 2011

याद पुरानी


वक़्त रेत की सकल बनाकर
मुट्ठी से यूँ निकल गया,
दाना चुंग मेरे आँगन से
कोई पंछी गुजर गया...

कभी पतंगों के पीछे
गाँव की गलियां छानी थीं,
ठंडी बारिश के ओले खाकर
हमने की मनमानी थी...

शाम ढले कुछ जुगनूं उड़कर
हमको बहुत लुभाते थे,
रात सितारों के नीचे बाबा
किस्से हमें सुनाते थे..

आज ये बारिश गीली भर है
ओले सारे सूख गए,
बाबा की बस याद रह गयी
जुगनूं बुझकर डूब गए...

Sunday, September 11, 2011

तू और क़ायनात


उस रोज़ कहीं साहिल में,
दो लहरें 
टकरायीं थीं शायद..

उस रोज़ कहीं फ़लक पे,
दो तारे मिलकर
टूटे थे शायद..

उस रोज़ कहीं गुलशन में.
कोई भंवरा
दीवाना हुआ शायद..

क्योंकि उस रोज़
तेरी आग़ोश में मैंने,
सारी क़ायनात से 
मोहब्बत कर ली थी शायद..

Saturday, September 3, 2011

मदहोश हवा



ये हवा आज खुशनुमां
कुछ मदहोश
बहकी हुई सी,
कुछ अनजाने, कुछ पहचाने
रास्तों से निकलकर
छज्जे पर मेरे-
सांस ले रही है...
उसकी धडकनें
बयां करतीं हैं,
कि आज तुम्हें छूकर गुज़री है... 


Friday, August 26, 2011

सुकून


आज तूने बहुत रुलाया है
अपनी आग़ोश में.. 

कुछ अनजाने ख्यालों से..
..ये दिल कुछ बेचैन था,
कौन से वो लम्हे थे..
अफ़सोस के ना जाने,
कि बस-
राह सी बन गयी,
..मेरे क़दमों से
तेरे क़दमों तलक.....
आज तूने बहुत रुलाया है,
..अपनी आग़ोश का
ये सुकून देकर..