Wednesday, November 17, 2010

विरह के मीठे पल (ग़ज़ल)


इस दिल के ख़ाली गुलशन में
कुछ महक रहे हैं गुल ऐसे,
कुछ अरमाँ उफ़न रहे हैं
कोई सहर उठ रही जैसे ||


कुछ पल ये अंदाज़ नया
मुझको अहसास दिलाता है,
धाराएँ कुछ तन और मन की
कहीं दूर मिल रहीं जैसे ||

कभी विरह के आलम में
ये पल कुछ ऐसा लगता है,
प्यासी धरती पर मेघदूत बन
एक चातक आया जैसे ||

इस पल के ऐसे बीतने पर
एक शीतलता छा जाती है,
इस तन को गरमानी वाली
कोई आग बुझ रही जैसे ||

Saturday, November 13, 2010

रे पंछी उड़ जा


शहर की भागा दौड़ी में,
काहे भूल गया पहचान,
रे पंछी उड़ जा,
तोहे बुलाये तेरा धाम..


बिसरे हैं अब नन्द जसोदा,
बिसरी घर गाम की गलियाँ,
वहां तो सब तौहार थे तेरे,
यहाँ ना वो रंग रलियाँ,
अरे किशन लड़े थे एक कंस से,
यहाँ हज़ारों नाम..
रे पंछी उड़ जा तोहे बुलाये तेरा धाम...

धन दौलत के चक्कर में
अपनों का संग था छूटा,
लोभ कि चटनी संग मिला
हर सख्स यहाँ था झूठा,
अंत समय अब यही सोचता
माया मिली ना राम...
रे पंछी उड़ जा
तोहे बुलाये तेरा धाम..

Thursday, November 11, 2010

दास्तान की खोज



एक नन्हीं सी दास्ताँ थी
कहीं खो गयी,
मैं भी निरा भुलक्कड़
सारे किरदार और 
भूमिका भी भूल गया..
शायद,
कोई किसान रहा होगा, विदर्भ का,
या फिर कोई बेरोज़गार, ग़ुमराह, अपराधी युवक..
मुंबई के फुटपाथ पे सोया हुआ
भिखारी भी हो सकता है,
और किसी भ्रष्ट नेता या अफ़सर की कल्पना से भी 
इनकार नहीं कर सकते..
लगता है-
सारे हिन्दुस्तान में खोजना पड़ेगा..

Tuesday, November 9, 2010

अनकहे जज़्बात


एकमुश्त, अनगिनत ख़याल उमड़े,
धडकनें तेज़ हुईं,
और दिमाग़ी तार आपस में उलझ गए,
जुबां ने साथ ना दिया,
हाथों ने कलम उठा ली
और उतार दिए सारे जज़्बात काग़ज़ पर,
देखा तो कुछ नज़्में
मेरी डायरी में अठखेलियाँ कर रहीं थीं..

Wednesday, November 3, 2010

संगीत और श्रृंगार


जब मिलती थीं उनसे नज़रें
सातों सुर खिल जाते मन में,
जो अधकच्चे रह जाते थे
वो तड़पाते फिर सपनों में..
    इस मन पगले ने ढूँढा है
    तुमको हर कवि की कविता में,
    संयोग में वो रस मिला नहीं
    जो है वियोग की सरिता में.. 
तुम कभी कभी उस महफ़िल में
मुझको आवाज़ लगाती थी,
जैसे मन के सब तारों को
अपने सुर से झनकाती थी...
    अब वीणा को झंकार भी दो
    मैं भी कुछ राग लगाऊंगा,
    संगीत का दरिया बहने दो
    मैं डूब के तर हो जाउंगा...

Tuesday, November 2, 2010

ऑर्डर

  
कपास के रेशों की तरह
कुछ ख़याल हैं ज़हन में,
ये मन जुलाहा उन्हें साफ़ कर
शफ्फाक़ रुई बना रहा है,
सूत तैयार होते ही बुनेगा..
एक और नज़्म का ऑर्डर आया है !!


Tuesday, October 26, 2010

ना सोया ना जागा हूँ...


ये उजला सा अँधेरा क्यूँ है,
फलक जगमगा रहा है
अमावस की रात की तरह,
मगर क्यों कोई तारा नहीं टिमटिमा रहा,
बस कुछ अजीब सी बुलबुलों जैसी आकृतियाँ,
जैसे किसी पेशेवर चित्रकार ने
तमाम ज्योमेट्री का ज्ञान एक स्याह कागज़ पे उड़ेल दिया हो,
एक दूसरे से टकराकर, इधर उधर भाग रही हैं,
जिसको देखने की कोशिश करो,
वो दुगुनी तेज़ी से उसी दिशा में भाग जाती है..
सोच रहा हूँ कोई सपना है,
मगर मैं सोया नहीं हूँ..

ज़रा हटा तो अपनी जुल्फों के बादल,
हकीक़त का सूरज देखना है....

Sunday, October 24, 2010

अफसानों की तलाश


कुछ और भी होंगे अफ़साने
कहीं दबे हुए,
अनगिनत ख़यालों और कुछ अनछुए पहलुओं को-
ख़ुद में समेटे हुए,
शायद कहीं अँधेरी गलियों के नुक्कड़ों पे
मिल जाएँ...
चलो ढूंढते हैं !!!

Friday, October 22, 2010

- क़लम और चांदनी -

देर कर दी आज,
चाँद ने उफ़क से उठने में,
पूछना था मुझे-
की ऐसा क्या है उसकी शफ्फाक चांदनी में,
जो दिन के सारे ग़मों को छानकर
मेरी क़लम की आहट को
ख़ुशनुमा कर देती है..
और
हर नज़्म इसमें धुलकर,
शब के अँधेरे अहसास को-
बहा ले जाती है..

आज चाँद ने उठने में देर कर दी,
क्योंकि,
आज मेरी क़लम ने-
ग़म और उदासी भरा दरिया बहाया है....

Friday, October 15, 2010

ये मन आवारा पंछी


इस मन आवारा पंछी का,
हर डाल बसेरा होता है,
कभी तो मंज़िल पाता है,
पर कभी ये सब कुछ खोता है..
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...


क्यूँ भटक रहा उन गलियों में,
जो अँधेरी सुनसान सी हैं,
क्यूँ बात ये ऎसी पूछ रहा,
जो सबके लिए अनजान सी है,
जब ऐसे हों हालात तो क्या, कभी सवेरा होता है,
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...


कोई दर्द रहा होगा ऐसा,
हर वक़्त इसे तड़पाता है,
शायद कोई शख्स रहा होगा,
जो इसे बहुत ही भाता है,
उन भूली बिसरी यादों को जब, ढूँढने निकला होता है,
इस मन आवारा पंछी का, हर डाल बसेरा होता है...