Monday, September 13, 2010

सपने ना गिर जाएँ..


तू चल राही पर ज़रा सम्हल,

मुट्ठी ना खुल जाए,
जो बीने हैं राहों से,
सपने ना गिर जाएँ...

कस के बाँध ले झोली,
जब तू दौड़े जीवनपथ पर,
कहीं तेरे आवेग में ये
झोली ना खुल जाए...

Tuesday, September 7, 2010

मेरे कुछ गीत पुराने..

कुछ रुकी हुई सी बातें,
और अनकहे अफ़साने,
रह रह कर गूँज रहे मन में,
मेरे कुछ गीत पुराने..
कुछ सुर थे बांस की बंसी पर,
कुछ एकतारे की तान पे थे,
जो राग अधूरे ठहरे थे,
वो वीणा की रुन्झान में थे..
ना जाने क्यों ये रुक सी गई,
जो कलम कभी दीवानी थी,
आवाज़ भी मेरी रूठ गई,
हर मौसम जो मस्तानी थी...
कुछ याद नहीं क्या भूल रहा,
शायद कुछ चला था गाने,
रह रह कर गूँज रहे मन में,
मेरे कुछ गीत पुराने..

Wednesday, September 1, 2010

यादों का पुलिंदा




तन्हाई में बैठे हुए अक्सर,
जेहन में कुछ ख्याल उभरते हैं
कुछ अधूरे और कुछ अटूट रिश्ते,
मन के खाली अशांत कौनों को
भरने लगते है..
और देखते ही देखते खुल जाता है
मेरी खोई हुई स्वप्ननगरी की
यादों का पुलिंदा !!!

इस पुराणी जर्जर पोटली के
फटे हुए कोनों से गिरती हैं
कुछ सहज सी सख्सियतें
देती थीं हर मोड़ और उलझनों भरे चौराहे पर
अपने भरोसे का सहारा...
कहते थे जिन्हें साथी हमकदम,
मेरी परछाई से भी वाकिफ थे...

आज समेट लेना चाहता हूँ
उन सारे लम्हों को
जो बिखरे पड़े हैं,
इस फटे और खुले हुए,
मेरी यादों के पुलिंदे से...............

Friday, May 14, 2010

लाल ज़मीं ?? (नज़्म)















ग़ाहे बगाहे मुझे याद आता है
मेरी ग़लती
पर
मास्टरजी ने बताया था,
"ज़मीं का रंग लाल नहीं होता"

आज यहाँ चौराहे पर
गांधीजी के क़दमों में
लगा है लाशों का ढेर
और मैं वहाँ ज़मीं को कुरेद कर
उसका वही असली रंग ढूँढ रहा हूँ
जो अभी लाल हुआ पड़ा है॥

Sunday, April 4, 2010

अंतराग्नि ( PAF २०१०, छात्रावास २, ७, ८ और तानसा हाउस IIT Bombay)




अंतराग्नि...
हर मानव के वजूद की लौ,
उसके सपनों का आधार,
हर मुश्किल से लड़ने का हौसला,
और उसकी विजय का प्रतिबिम्ब...
ये उसकी अंतराग्नि....

चाहे तो तू बुरा है, चाहे तो भला है,
तेरे ही कर्मों की छाया से,
तेरा अस्तित्व निकला है...
गर चाहता है अँधेरे में सूरज की चमक,
और कर्मों में सिंह सा जोश,
तो प्रज्ज्वलित कर...
अपनी अंतराग्नि....

रख विश्वास तू खुद पर,
ना बैठ निर्जीव सा होकर,
तेरी राहों की हर बाधा,
और अंतर्मन की हर व्याधा,
भस्म कर देगी...
ये तेरी अंतराग्नि....

Thursday, February 25, 2010

बंदिशें (नज़्म)



लफ्ज़ बाहर आने को मचलते हैं,
हर ख़याल के साथ, तस्वीरों से उभरते हैं,
बंदिशें लगाती है ज़िन्दगी की सच्चाइयाँ,
हर बार ये बावरे बोल हलक से निकलते हैं,
"
एक बार तो मुझे अपने ख़यालों के साथ फुर्सत में बैठने दो॥"...

Thursday, February 11, 2010

घरोंदा


बारिश की हल्की बौछारों से,
लगी महकने गीली मिट्टी,
पाँव के ऊपर उसे लगाकर,
मैंने थापा एक घरोंदा,
भोलू से अच्छा मोनू से प्यारा,
सबसे सुन्दर मेरा घरोंदा॥

टूटी चूड़ी के टुकड़ों से उसे सजाया,
रंग बिरंगे धागों का घेर बनाया,
गोल गोल से छोटे पत्थर से,
चुन्नू, मुन्नी और माँ को बनाया,
अपने भोले सपनों से सजाकर,
मैंने थापा प्यारा घरोंदा॥

मौसम बीते बरस बीते,
और जीवन की भाग दौड़ में,
ना जाने कितने सपने बीते,
हर सपने को बुनियाद बनाकर,
मैंने जोड़ा एक शीशमहल॥

आज समय की आँधी में,
खो गए वो भोले सपने,
शीशमहल की आड़ में जो छुप गए,
चुन्नू, मुन्नी और माँ थे॥
आज में अपने शीशमहल में,
ढूँढ रहा हूँ वही घरोंदा,
अपने भोले सपने से सजाकर,
मोनू से अच्छा, भोलू से प्यारा,
मैंने थापा था जो घरोंदा॥

Thursday, July 23, 2009

मैं अपरिचित


आज होकर इस जहाँ से, जा रहा हूँ मैं अपरिचित,
जब जिया तब था अपरिचित , ख़ुद से और संसार से ।

जिस ज़मीं को जानता था , जिस धरम को मानता था ,
चाहता था मैं जिन्हें वो लोग भी अब हैं अपरिचित ।

अग्नि धरा आकाश से , वायु और जल की प्यास से ,
था बना कण कण जो मेरा , आज वो कण भी अपरिचित ।

मिट्टियों में खेलता था , उघरे बदन मैं दौड़ता था ,
कल्पनाओं का समंदर , आज वो बचपन अपरिचित ।

माँ की ममता ने सिखाया , गुरुजनों ने भी बताया ,
ढाई अक्षर से बना , वो प्रेम भी अब है अपरिचित ।

भूल और संज्ञान में , जो किए मैंने करम ,
उनका फल ले कर जहाँ से, जा रहा हूँ मैं अपरिचित ।

कल मरना मुझे गंवारा है



आज सुहानी सुबह हुई, सूरज का बुलंद सितारा है ,
मस्त हवा के झोंके ने, हर वृक्ष का बदन उघारा है ,
ऐसे मस्ती के मौसम में, जब साथ तुम्हारा प्यारा है,
आज बचा लो यारो, कल मरना मुझे गंवारा है !!

हर फूल की बाहें खुली हुई, भंवरों की दीवानी हैं ,
हर पत्ती पत्ती खिली हुई, मौजों की अलग कहानी है ,
दूर क्षितिज पर आज किसी ने , मल्हारी राग पुकारा है ,

आज बचा लो यारो, कल मरना मुझे गंवारा है !!

ज़र्रे ज़र्रे मैं जीवन है , महका मिट्टी का हर कण है ,
दिन चला शाम से मिलने को , बढती उसकी हर धड़कन है ,
उनके मिलन के इन्द्र धनुष को , प्रकृति ने सजा संवारा है ,
आज बचा लो यारो, कल मरना मुझे गंवारा है !!

मदमस्त समय के जाने पर , अब रात सुहानी आई है ,
आकाश से बादल चले गए , तारों की महफ़िल छाई है ,
मन करता है चला जाऊ इनमे , चंदा ने डोल उतारा है ,
खो जाऊँ गर तारों में , ऐसा अंत भी मुझको प्यारा है !!

आज कलम उठ जाने दो !!



कई दिनों से सोये मन में
आज लहर बह जाने दो ,
गहन विचारों के मंथन में
आज कलम उठ जाने दो !!

मुझे साज़ का ज्ञान नही है
स्वर लहरों का भान नही है
किंतु म्रदंगी की थापों पर
आज कदम उठ जाने दो ,
गहन विचारों के मंथन में
आज कलम उठ जाने दो !!

अंतर्मन के कोलाहल में
सुलगालो एक चिंगारी
फ़िर उस चिंगारी के ऊपर
आज पवन बह जाने दो ,
गहन विचारों के मंथन में
आज कलम उठ जाने दो !!